date_range 25 Feb, 2020

कुम्हार की कला पर भारी पड़ती चाइनीज झालर


दीपावली के पर्व पर हजारों-लाखों घरों को रोशनी से जगमग करने वाले कुम्हारों की जिंदगी मे आज भी अंधेरा ही अंधेरा है। आधुनिकता की चकाचौंध ने कुम्हारों के सामने जीवन यापन का संकट खड़ा कर दिया है। हाड़तोड़ मेहनत व अपनी कला के चलते मिट्टी के दीये व दूसरे बर्तन बनाने वाले कुम्हारों को आज दो वक्त की रोटी के लिए परेशान होना पड रहा है। दीपावली के समय जो कुम्हार दम भरने की फुरसत नहीं पाते थे वही आज मिट्टी के चंद दीये बना आस-पास के बाजार मे बेचने के लिए जाते है, वहाँ भी पूरे दीये बिक जाये इस बात की आशंका बनी रहती है। बाजार मे दीयों की जगह आधुनिक तरह की तमाम रंग बिरंगी चाइनीज बिजली की झालरों ने ले लिया है। मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कुम्हारों के सामने समस्या ही समस्या मुँह बाए खड़ी है। दीये व दूसरे बर्तन बनाने के लिए गाँव के जिन तालाबों से ये कुम्हार मिट्टी निकलते थे उस पर अब लोगों को आपत्ति है। सरकार से भी किसी तरह की मदद इनको नहीं मुहैया हो पाती है। मिट्टी के बर्तन बनाकर परिवार चलाने वाले कुम्हारों के तमाम परिवार आज भी मिट्टी के टूटे-फूटे घरों मे रहने को विवश हैं। इन्हे इस बात का मलाल है कि उन्हे न तो जनप्रतिनिधि और न ही शासन से कोई मदद मिल रही है।

गोल-गोल घूमते पत्थर के चाक पर मिट्टी के दीये बनाते इन कुम्हारों की अंगुलियों मे जो कला है वह दूसरे लोगों मे शायद ही हो। घूमते चाक पर मिट्टी के दीये व दूसरे बर्तन बनाने वाले इन कुम्हारों की याद दीपावली आने से पहले हर शख्स को आ जाती है। तालाबों से मिट्टी लाकर उन्हे सुखाना, सूखी मिट्टी को बारीक कर उसे छनना और उसके बाद गीली कर चाक पर रख तरह तरह के बर्तन व दीये बनाना इन कुम्हारों की जिंदगी का अहम काम है। इसी हुनर के चलते कुम्हारों के परिवार का भरण पोषण होता है। पत्थर के चाक पर गीली मिट्टी को आकार देने वाले कुमारों के हाथों की उंगलियों मे मानों जादू होता है। देखते ही देखते मिट्टी को आकार देना इनका पुश्तैनी काम अब इन्हे नहीं भा रहा है। क्यो कि बाजार मे प्लास्टिक व अन्य सामानों की भरमार हो गई है। चाय की दुकान से लेकर मीठे पकवानों के दुकानों मे प्लास्टिक के बर्तनों ने जगह बना लिया है। मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कुम्हारों को दिन भर मेहनत के बाद चंद रूपये ही हांथ मे आ पाते है। इसके अलावा कुम्हार जिन तालाबों से मिट्टी निकलते थे उस पर अब ग्राम प्रधानों ने बन्दिशें लगा दिया है। ऊपर से शासन भी इनका साथ नहीं दे रहा है। जनप्रतिनिधियों की बेरुखी इन्हे और भी रुलाती है।


एक जमाना था जब दीपों का त्योहार दीपावली आती थी तो कुम्हारों की दिनचर्या ही बदल जाती थी। दीपावली आने से महीनों पहले कुम्हार पूरे परिवार के साथ मिलकर दीये तैयार करने मी जुट जाते थे। कुम्हारों को साल भर रोशनी के पर्व का इंतजार रहता था। आखिर इंतजार भी क्यों न रहे, यही त्योहार उनकी मेहनत के बदले उन्हे खुशियाँ देता था। दीये बनाने से जो कमाई होती थी उससे साल भर पूरे परिवार का खर्च आराम से चलता था। समय बदला और हर कोई आधुनिकता के रंग मे रंगने लगा। आधुनिकता की सबसे बड़ी मार यदि किसी को पड़ी है तो वह कुम्हार ही है। मिट्टी के दीये व दूसरे बर्तन बनाकर जीवन यापन करने वाले कुम्हारों का पुश्तैनी काम अब मंदा पद गया है। आधुनिक बाजार मे अब प्लास्टिक व दूसरी चकाचौंध करने वाले सामानों ने ले लिया है। दीयों की जगह अब रंग बिरंगी चाइनीज झालरों से लोगों के घर रोशन हो रहे है। इतना सब होने के बाद भी कुम्हार दीपावली के समय याद जरूर आते है।

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