कुतुबमीनार से भी ऊंचा है कर्नाटक का ये मंदिर, भगवान शिव और रावण से जुड़ा है इसका इतिहास

भगवान शिव के प्रसिद्ध धाम मुरुदेश्वर मंदिर से जुड़े खास रहस्यों के बारे में बताते है। जिनको जानकर आप लोगों का मन खुश हो जाएगा और आपको एक बार फिर से अपने प्राचीन समय पर गर्व महसूस करने का मौका मिलेगा...

कुतुबमीनार से भी ऊंचा है कर्नाटक का ये मंदिर, भगवान शिव और रावण से जुड़ा है इसका इतिहास
मुरुदेश्वर मंदिर [फोटो क्रेडिट इंस्टाग्राम]

हिन्दू धर्म में सावन का महीना सबसे  पवित्र मना जाता है और यह महीना भगवान शिव को सबसे ज्यादा पसंद होता है। इसीलिए इस मौसम में शिव जी की आराधना करने से मनचाहा लाभ मिलता है और हमारे सारे दुख तकलीफ दूर हो जाते है।  इस खास मौके पर भगवान शिव के प्रसिद्ध धाम मुरुदेश्वर मंदिर के बारे में बताते है जो  238 फीट ऊंचे कुतुब मीनार से भी करीब 11 फीट ऊंचा है। कर्नाटक के कन्नड़ जिले में स्थित श्री मुरुदेश्वर मंदिर की ऊंचाई  249 फीट  है। तो चलिए हम आपको इस खास मौके पर भगवान शिव के प्रसिद्ध धाम मुरुदेश्वर मंदिर से जुड़े खास रहस्यों के बारे में बताते है। जिनको जानकर आप लोगों का मन खुश हो जाएगा और आपको एक बार फिर से अपने प्राचीन समय पर गर्व महसूस करने का मौका मिलेगा...


क्या आप जानते हैं?

कुतुबमीनार से भी ऊंचा है कर्नाटक का ये मंदिर!

- मुरुदेश्वर मंदिर कर्नाटक राज्य के  कन्नड़ जिले में बना हुआ है जो तीनों ओर से अरब सागर से घिरा है।

- इस मंदिर में भगवान शिव की एक विशाल मूर्ति बनी हुई है। जिसे दुनिया की दूसरी सबसे ऊंची शिव मूर्ति माना  है। 

-  कुतुब मीनार की ऊंचाई  238 फीट जबकि मुरुदेश्वर मंदिर की ऊंचाई  249 फीट  है।

-  शिव जी की इस विशाल मूर्ति की ऊंचाई लगभग 123 फीट है। जिसकी वजह से मूर्ति हमेशा चमकती रहती है।

-  रावण ने जो आत्मलिंग धरती पर रखा था। जिस वजह से इस मंदिर का निर्माण हुआ।

-  समुद्र तट पर बने होने की वजह से यहां का प्राकृतिक वातावरण हर किसी मनुष्य का मन मोह लेता है।

- इस शिवलिंग की स्थापना का समय वह माना जाता है, जब रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करके आत्मलिंग लेकर लंका जा रहा था।

- पौराणिक कथा शिव पुराण में इस कथा का विस्तार से वर्णन  किया गया है, कैसे देवताओं ने रावण का ध्यान हटाया था।

- मुरुदेश्वर भगवान शिव का ही एक नाम है। जिनको लोग अपनी भक्ति से प्रसन्न करना चाहते है।

- इस मंदिर का इतिहास रामायण काल से जुड़ा हुआ है इस बात की जानकारी कई पौराणिक कथाओं में मिलती है