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अटल जी की कविता : क्या खोया, क्या पाया जग में

अपने ही मन से कुछ बोलें क्या खोया, क्या पाया जग में, मिलते और बिछड़ते मग में, मुझे किसी से नहीं शिकायत, यद्यपि छला ग

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By Cool Collection | Mumbai, Maharashtra | Citizen - 17 August 2018

अपने ही मन से कुछ बोलें क्या खोया, क्या पाया जग में, मिलते और बिछड़ते मग में, मुझे किसी से नहीं शिकायत, यद्यपि छला गया पग-पग में, एक दृष्टि बीती पर डालें, यादों की पोटली टटोलें। पृथिवी लाखों वर्ष पुरानी, जीवन एक अनन्त कहानी पर तन की अपनी सीमाएं यद्यपि सौ शरदों की वाणी, इतना काफी है अंतिम दस्तक पर खुद दरवाजा खोलें। जन्म-मरण का अविरत फेरा, जीवन बंजारों का डेरा, आज यहां, कल कहां कूच है, कौन जानता, किधर सवेरा, अंधियारा आकाश असीमित, प्राणों के पंखों को तौलें। अपने ही मन से कुछ बोलें!
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