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रेगिस्तान की रेत ऊँटों की चाल और हवा में घुली वो मीठी तान — “केसरिया बालम आवो नी, पधारो म्हारे देश…” आज ये गीत राजस्थान की पहचान है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस गीत के पीछे छिपी है एक ऐसी प्रेम कहानी, जो सदियों पुरानी है… ढोला और मारू की कहानी।
बहुत पुरानी बात है राजस्थान के मरुस्थल में बसे थे दो राज्य — नारवर और पिंगल। नारवर के राजकुमार थे ढोला, और पिंगल की राजकुमारी थीं मारू। जन्म के समय ही दोनों का रिश्ता तय कर दिया गया था। तब ढोला सिर्फ तीन साल का था और मारू महज डेढ़ साल की. अब शादी हो गई, लड़के वाले अपने राज्य लौट आए और मारू को बचपने के कारण ही पीहर में रोक लिया गया और तय हुआ कि समझदार होने पर उसकी धूम-धाम से विदाई कर दी जाएगी. इस बात को दिन-महीने साल और बरस बीतने लगे. इसी बीच पिंगल में अकाल आया और पता चला कि पूरा राज्य ही तितर-बितर हो गया. रह-रहकर इस बात के भी कई साल गुजर गए. ढोला जवान हुआ तो उसकी दूसरी शादी कर दी गई. बचपन में हुई शादी के बारे में ढोला भी लगभग भूल चुका था, लेकिन उसकी पत्नी को कहीं से ढोला की शादी के बारे में पता चल गया और ये भी पता चला कि पिंगल राजा, अकाल के कारण किसी और जगह चला गया था, उसका परिवार अभी जिंदा है और मारू तो ऐसी खूबसूरत है कि उसके जैसी कोई सात देशों तक नहीं है. उधर, मारू के घरवालों ने राजा नरवर के पास विदा करा लाने के लिए कई संदेश भेजे, लेकिन सौतिया जलन के कारण ढोला की पत्नी हर बार संदेशवाहकों को नरवर की सीमा पर ही मरवा देती थी और उसने एक भी संदेश राजा तक या ढोला तक नहीं पहुंचने दिया. एक दिन मारू ने सपने में देखा कि कोई उसे पुकार रहा है, लेकिन वो उसका चेहरा न देख पाती थी. प्रेम भरी इस पुकार से विकल हुई मारू ने अपने पिता पिंगल से फिर से ढोला तक संदेशा भेजने की विनती की. मारू ने तय किया — अगर प्रेम सच्चा है तो ढोला जरूर लौटेंगे। उन्होंने ढोला को संदेश भिजवाया, गीतों के जरिए लोकगाथाओं के जरिए कई कथाओं में बताया जाता है कि मारू ने ढोला को बुलाने के लिए लोकगीत गुनगुनाए। यही वे स्वर थे जो आगे चलकर ‘केसरिया बालम’ के रूप में अमर हो गए। गीत में पूंगल सुनते ही ढोला का सिर चकराने लगा. उसे ये नाम कुछ सुना हुआ और जाना-जाना सा लगा. उसका दिल तड़पने लगा. उसने ढोली को आवाज देकर कहा- और गाओ तब ढोली और नर्तकी ने ऊंची टेर लगाकर गाया. ये सुनते ही ढोला को अपनी मारू, अपनी ससुराल पिंगल और अपना प्रेम सब याद आ गया. वह तुरंत तेज दौड़ने वाले काले ऊंट पर सवार हो, पिंगल पहुंचा लेकिन ये सफर आसान नहीं था। रेत के तूफान… प्यास… और सामाजिक विरोध। कहा जाता है कि ढोला–मारू ऊँट पर सवार होकर रेगिस्तान पार कर रहे थे तभी रास्ते में धोखे, साज़िश और पीड़ा उनका इंतज़ार कर रही थी।
अधूरी लेकिन अमर कहानी
कुछ लोककथाओं में कहा जाता है कि दोनों का मिलन त्रासदी में बदल गया। तो कुछ कथाओं में ढोला–मारू को प्रेम की जीत बताया गया। लेकिन चाहे अंत जैसा भी हो, एक बात तय है— ढोला–मारू का प्रेम राजस्थान की आत्मा बन गया।
कैसे बना ‘केसरिया बालम’ राजस्थान की पहचान?
मारू की प्रतीक्षा… ढोला की वापसी… और प्रेम से भरा आमंत्रण— इन्हीं भावनाओं से निकला गीत—“केसरिया बालम आवो नी, पधारो म्हारे देश…” इस गीत में मारू की पुकार है… प्रीतम के स्वागत का अनुरोध है… और राजस्थान की मेहमाननवाज़ी है। आज ये गीत राजस्थानी संस्कृति, लोकनृत्य, पर्यटन और प्रेम का प्रतीक बन चुका है। ढोला–मारू केवल एक प्रेम कहानी नहीं… ये कहानी है वचन की, इंतज़ार की, और उस प्यार की जो समय और दूरी से नहीं डरता। और जब भी ‘केसरिया बालम’ गूंजता है, तो लगता है जैसे—मारू आज भी कह रही हों— “आओ मेरे बालम… पधारो म्हारे देश।”




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