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ट्रांसजेंडरों को 'बधाई' मांगने का कोई कानूनी अधिकार नहीं: इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले से बड़ी बहस छिड़ी!

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने फैसला सुनाया कि ट्रांसजेंडर (किन्नर) व्यक्तियों के पास पारंपरिक "बधाई" और "नेग"—जन्म या शादी जैसे खुशी के मौकों पर पैसे के रूप में दिए जाने वाले पारंपरिक उपहार—के लिए पैसे इकट्ठा करने का कोई मौलिक या कानूनी अधिकार नहीं है।

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By Jigyasa Sain | Faridabad, Haryana | खबरें - 30 April 2026


लखनऊ, अप्रैल 2026: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि ट्रांसजेंडर लोगों के पास तथाकथित "बधाई" या "नेग"—जन्म, शादी या गृह प्रवेश जैसे खुशी के मौकों पर दिए जाने वाले पारंपरिक उपहार—प्राप्त करने का कोई अधिकार नहीं है।

जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की बेंच ने गोंडा जिले की एक ट्रांसजेंडर महिला रेखा देवी की याचिका को खारिज कर दिया। रेखा देवी ने कोर्ट से "बधाई" इकट्ठा करने के लिए एक निश्चित क्षेत्र (इलाके) के सीमांकन और सुरक्षा के लिए आदेश देने की मांग की थी। उन्होंने इस प्रथा का हवाला दिया और आरोप लगाया कि समुदाय के अन्य सदस्य उनके इलाके में घुसपैठ कर रहे हैं, जिससे आपसी विवाद पैदा हो रहे हैं।

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि 'बधाई' या 'जजमानी' के नाम पर पैसे/उपहार इकट्ठा करने के लिए कोई कानून या कानूनी अधिकार मौजूद नहीं है। इसमें कहा गया कि कोई भी अनिवार्य वसूली, ज़बरदस्ती वसूली या अवैध मांगों से संबंधित 'भारतीय न्याय संहिता' (BNS) के दायरे में आ सकती है।

अदालत ने दोहराया कि कोई सांस्कृतिक प्रथा समाज में मौजूद हो सकती है, लेकिन संविधान के अनुच्छेद 14, 19 या 21 के तहत इसे कानूनी या मौलिक अधिकार के रूप में दावा नहीं किया जा सकता। अदालत ने ऐसे फंड इकट्ठा करने के लिए क्षेत्रीय अधिकारों और पुलिस सहायता के विचार को भी खारिज कर दिया।

इस मामले ने इस बात पर बहस छेड़ दी है कि ट्रांसजेंडर समुदाय की पारंपरिक प्रथाओं को समकालीन कानून के साथ कैसे जोड़ा जाए।

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