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नई दिल्ली, November 8, 2026: इसराइल: नेतन्याहू जितनी ही सख़्त नीतियां, फिर भी अरब पार्टियों ने आइज़नकोट का क्यों किया समर्थन।
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लोड हो रहा है लोड हो रहा है इसराइल में नई सरकार के गठन की कवायद के बीच अरब राजनीतिक दलों ने पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइज़नकोट को समर्थन देने का फ़ैसला किया है. राष्ट्रपति इसाक हर्ज़ोग ने भी उन्हें सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया है.
गादी आइज़नकोट के पास अब नई सरकार बनाने की कोशिश करने के लिए 28 दिन होंगे, जिनमें 14 दिन का संभावित विस्तार भी शामिल है.
इसराइल की 120 सदस्यीय संसद में सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन ज़रूरी है. आइज़नकोट के पक्ष में छह राजनीतिक दलों के कुल 67 सांसदों का समर्थन बताया जा रहा है.
वहीं, बिन्यामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाले गठबंधन को बहुमत से काफ़ी कम समर्थन हासिल है. इसी वजह से राष्ट्रपति ने उन्हें सरकार बनाने का पहला मौक़ा नहीं दिया.
हालांकि, आइज़नकोट की नीतियों को लेकर भी फ़लस्तीन समर्थक हलकों में सवाल उठते रहे हैं. वह नेतन्याहू की वॉर कैबिनेट का हिस्सा रह चुके हैं और फ़लस्तीन के मुद्दे पर उनकी नीतियां भी सख़्त मानी जाती हैं.
ऐसे में सवाल है कि नेतन्याहू और आइज़नकोट दोनों के कट्टरपंथी रुख़ के बावजूद अरब राजनीतिक दलों ने आइज़नकोट का समर्थन क्यों किया?
दरअसल, अरब दलों का यह फ़ैसला आइज़नकोट की नीतियों से सहमति से ज़्यादा नेतन्याहू को सत्ता से बाहर रखने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है.
इसराइल के अरब राजनीतिक दलों के गठबंधन ज्वाइंट लिस्ट के अध्यक्ष यूसुफ़ जबारीन ने भी इसी राजनीतिक मजबूरी की ओर इशारा करते हुए कहा था, ''हम अच्छे और बेहतर के बीच चुनाव नहीं कर रहे हैं, बल्कि हमारे सामने ख़राब और उससे भी ख़राब विकल्प हैं.''
दिल्ली स्थित थिंक-टैंक भारतीय वैश्विक परिषद (आईसीडब्ल्यूए) में सीनियर फ़ेलो और मिडिल ईस्ट मामलों के जानकार डॉ. फ़ज्जुर रहमान सिद्दीकी के मुताबिक़, अरब दलों का आइज़नकोट को समर्थन देने का फ़ैसला उन्हें सत्ता में लाने से ज़्यादा नेतन्याहू को सत्ता से बाहर रखने की कोशिश है.
वह कहते हैं कि अरब दलों की प्राथमिकता यह नहीं है कि आइज़नकोट प्रधानमंत्री बनें या वे ख़ुद सरकार का हिस्सा बनें. उनकी पहली कोशिश यह है कि नेतन्याहू दोबारा प्रधानमंत्री न बन पाएं.
डॉ. सिद्दीकी ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "अरब दलों को पता है कि नेतन्याहू और आइज़नकोट की फ़लस्तीन, ग़ज़ा, वेस्ट बैंक और हमास जैसे मुद्दों पर नीतियों में बहुत बड़ा अंतर नहीं है. ऐसे में आइज़नकोट का समर्थन करने का मतलब उनकी नीतियों का समर्थन करना नहीं है. पिछले तीन वर्षों में ग़ज़ा में जो कुछ हुआ और नेतन्याहू सरकार ने जिस तरह फ़लस्तीनियों के साथ व्यवहार किया, उसके बाद अरब राजनीतिक दलों के लिए उन्हें सत्ता से बाहर रखना प्राथमिकता बन गया है."
इसराइल में अरब दल यह भी नहीं चाहते कि वे ऐसी सरकार का हिस्सा बनें, जिसकी नीतियों को उनके मतदाता स्वीकार नहीं करते. उनके लिए ऐसा करना अपने राजनीतिक आधार और उन लोगों के भरोसे के साथ समझौता करने जैसा होगा, जिन्होंने उन्हें वोट दिया है.
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स्रोत: Instafeed Desk।
तस्वीर: JJ Harrison ( https://www.jjharrison.com.au/ ), Wikimedia Commons, CC BY-SA 3.0

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