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क्या आपको ₹10 लाख का इन्वेस्टमेंट एक ही फिक्स्ड डिपॉजिट में करना चाहिए या इसे ₹1-₹1 लाख की दस FD में बांट देना चाहिए? अगर ब्याज दर, समय-सीमा (tenure) और कंपाउंडिंग एक जैसी हैं, तो मैच्योरिटी पर मिलने वाली रकम लगभग एक जैसी ही रहती है।
एक बड़ी FD को ट्रैक करना आसान होता है — एक अकाउंट, एक मैच्योरिटी तारीख और कम कागजी कार्रवाई। हालांकि, इसकी एक बड़ी कमी है: अगर आपको थोड़ी सी भी रकम की ज़रूरत पड़ती है, तो आपको पूरी डिपॉजिट तोड़नी पड़ती है और पूरी रकम पर समय से पहले पैसे निकालने की पेनल्टी देनी पड़ती है।
कई छोटी FD के साफ फायदे हैं। इमरजेंसी में आप सिर्फ़ एक FD तोड़ सकते हैं जबकि बाकी FD पर ब्याज मिलता रहता है। अलग-अलग बैंकों में FD बांटने से DICGC इंश्योरेंस कवर (अभी प्रति बैंक प्रति जमाकर्ता ₹5 लाख है) का भी ज़्यादा फायदा मिलता है। समय-सीमा को अलग-अलग रखने (लैडरिंग) से ब्याज दरें बढ़ने पर बेहतर दरों पर दोबारा इन्वेस्ट करने में भी मदद मिलती है।
ज़्यादातर इन्वेस्टर्स के लिए, जो फ्लेक्सिबिलिटी और सुरक्षा को अहमियत देते हैं, रकम को छोटी FD में बांटना ज़्यादा समझदारी भरा फैसला है।




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