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राजदीप सरदेसाई का कॉलम: बार-बार क्यों उठ खड़ा होता है "विदेशी हाथ' का सवाल ?

नई दिल्ली: दैनिक भास्कर में छपे अपने कॉलम में पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने इस बात की जाँच की है कि भारतीय राजनीति में “विदेशी हाथ” का सवाल बार-बार क्यों खड़ा होता है। ताजा संदर्भ संघ प्रमुख मोहन भागवत की वह टिप्पणी है, जिसमें उन्होंने सरकारों को अस्थिर करने वाली “वैश्विक साजिश” का जिक्र किया। भागवत का संकेत था कि फ्रांस, अल्बानिया, बांग्लादेश और नेपाल की तरह भारत भी ऐसे निशाने पर आ सकता है।

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Image Credit: Instafeed Desk
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By Pandey Gaurav | Mumbai, Maharashtra | राजनीति - 05 November 2026

नई दिल्ली: दैनिक भास्कर में छपे अपने कॉलम में पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने इस बात की जाँच की है कि भारतीय राजनीति में “विदेशी हाथ” का सवाल बार-बार क्यों खड़ा होता है। ताजा संदर्भ संघ प्रमुख मोहन भागवत की वह टिप्पणी है, जिसमें उन्होंने सरकारों को अस्थिर करने वाली “वैश्विक साजिश” का जिक्र किया। भागवत का संकेत था कि फ्रांस, अल्बानिया, बांग्लादेश और नेपाल की तरह भारत भी ऐसे निशाने पर आ सकता है।

सरदेसाई लिखते हैं कि भारत इनमें से किसी देश की नकल नहीं है। हर समाज के अपने राजनीतिक हालात, भीतरी तनाव और प्रदर्शनों के सीधे कारण होते हैं। एक जगह के विरोध की तस्वीरें दूसरे देश पर चिपका देना, खासकर भारत जैसे विशाल और विविध देश पर, ठीक नहीं। अलग-अलग देशों में हो रहे प्रदर्शनों को एक साझा विदेशी साजिश का प्रमाण मान लेना भी सही नहीं।

उनका कहना है कि “विदेशी हाथ” भारतीय राजनीति का पुराना सहारा है। जिन सरकारों को देश की असुविधाजनक सच्चाई से मुँह मोड़ना आसान लगता है, वे दोष बाहरी ताकतों पर डाल देती हैं। 1970 के दशक में इंदिरा गांधी के समय जनआंदोलनों और राजनीतिक विरोध को अक्सर विदेशी दखल के रूप में पढ़ा गया। सीआईए की साजिश का नाम लिया जाता था। उस दौर में संघ को भी शक की नजर से देखा गया। लोग सत्ता के खिलाफ क्यों हो रहे हैं, यह पूछने के बजाय दुश्मन विदेश में ढूँढना आसान रहा।

कॉलम 2026 का उदाहरण भी देता है। कुछ महीने पहले पेपर-लीक के मुद्दे पर सरकार के प्रतिनिधि “कॉकरोच जनता पार्टी” से बात कर रहे थे। अब उसी जेनरेशन-जेड के नेतृत्व वाले विरोध को विदेशी साजिश की तरह देखा जा रहा है। सरदेसाई पूछते हैं कि बीच में बदला क्या है। क्या विदेशी पैसे के सबूत आए हैं, या “विदेशी हाथ” का खयाल इतना सुविधाजनक है कि उसे छोड़ना मुश्किल हो गया है।

इसी शक का सिलसिला राहुल गांधी की गतिविधियों पर भी चलता रहा है। उनकी निजी विदेश यात्रा तक को इस तरह पेश किया जाता है जैसे वे पर्दे के पीछे देश के खिलाफ साजिश रच रहे हों। कॉलम के मुताबिक ऐसे इशारे बिना सबूत के आरोप लगाने का जरिया हैं। इससे विपक्ष की राजनीति अपने आप संदिग्ध हो जाती है और सवाल उठाने वाले को विदेशी ताकतों का एजेंट बताया जा सकता है।

सरदेसाई की माँग साफ है। अगर विपक्षी नेता, छात्र कार्यकर्ता और प्रदर्शनकारी सच में विदेश से चल रही साजिश का हिस्सा हैं, तो यह साबित होना चाहिए। देश के पास जाँच और खुफिया एजेंसियाँ हैं। देश को अस्थिर करने की योजना या गैरकानूनी विदेशी फंडिंग के भरोसेमंद सबूत हों, तो उन एजेंसियों को कानून के तहत जाँच करनी चाहिए और कार्रवाई करनी चाहिए। कॉलम पूछता है कि वे सबूत आखिर कहाँ हैं।

वे यह नहीं कहते कि विदेशी दखल होता ही नहीं। भारत और दूसरे देशों को पहले भी बाहर से असली दबाव झेलना पड़ा है। फर्क इस बात का है कि एक स्पष्ट विदेशी षड्यंत्र को पहचानना अलग है, और सड़क पर उतरे नागरिकों को वैश्विक साजिश बता देना अलग। बेरोजगारी, परीक्षा में गड़बड़ी, भ्रष्टाचार या संस्थाओं की स्वतंत्रता घटने के डर से नाराज होने के लिए लोगों को विदेशी प्रायोजक की जरूरत नहीं। युवा अपने भविष्य की चिंता के लिए विदेश से आदेश का इंतजार नहीं करते। राजनीतिक नाराजगी सिर्फ इसलिए गैरकानूनी नहीं हो जाती कि वह सड़क पर दिख रही है।

कॉलम की चेतावनी है कि “विदेशी हाथ” की कहानी शांतिपूर्ण असहमति को गलत ठहराने और सख्ती को जायज बताने का औजार बन सकती है। लोकतंत्र में गैरकानूनी काम और जायज विरोध के बीच फर्क रखना जरूरी है।

यह ब्यौरा दैनिक भास्कर पर छपे राजदीप सरदेसाई के कॉलम पर आधारित है। Instafeed Desk ने इसे 5 नवंबर 2026 को राजनीति खंड में दर्ज किया।

फोटो क्रेडिट: Photo: bhaskar.com

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