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मुगल सम्राट औरंगजेब का सपना था संपूर्ण भारत को जीतकर अपने साम्राज्य का विस्तार करना, लेकिन दक्षिण भारत उसके लिए सबसे कठिन चुनौती साबित हुआ। साल 1680 में दिल्ली की गद्दी को छोड़कर औरंगजेब अपनी विशाल सेना के साथ दक्षिण भारत की विजय के लिए निकला। लेकिन यह यात्रा आसान नहीं थी। दक्षिण भारत में मराठाओं के नेतृत्व में मुगलों का जबरदस्त विरोध हुआ। इस संघर्ष ने मुगलों की ताकत को कमजोर कर दिया और औरंगजेब के साम्राज्य की नींव हिल गई।
मराठाओं से औरंगजेब का संघर्ष
औरंगजेब के दक्षिण विजय अभियान में सबसे बड़ी चुनौती मराठा साम्राज्य था, जिसकी नींव छत्रपति शिवाजी महाराज ने रखी थी। उन्होंने मुगलों के खिलाफ स्वतंत्र मराठा राज्य की स्थापना की थी। उनके निधन के बाद उनके पुत्र संभाजी महाराज ने मराठाओं का नेतृत्व संभाला और औरंगजेब को दक्षिण भारत में टिकने नहीं दिया। संभाजी महाराज की वीरता ने मुगलों को बार-बार हराया, लेकिन दुर्भाग्य से 1689 में मुगलों ने छल से उन्हें पकड़ लिया और बड़ी क्रूरता से उनकी हत्या कर दी।
संभाजी महाराज की हत्या के बाद भी मराठाओं का संघर्ष नहीं रुका। उनके भाई राजा राम भोंसले को मराठा साम्राज्य का नया छत्रपति बनाया गया और उन्होंने मुगलों के खिलाफ संघर्ष जारी रखा। राजा राम ने मुगलों के खिलाफ कई सफल अभियानों का नेतृत्व किया, लेकिन महज 30 वर्ष की उम्र में उनका भी निधन हो गया। राजा राम के निधन के बाद ऐसा लगने लगा था कि मराठा साम्राज्य कमजोर हो जाएगा और मुगलों का दक्षिण विजय अभियान सफल हो जाएगा। लेकिन तभी मराठा इतिहास में एक और नायिका उभरी—रानी ताराबाई भोंसले।
रानी ताराबाई भोंसले: मराठा साम्राज्य की रक्षा करने वाली वीरांगना
राजा राम भोंसले की पत्नी रानी ताराबाई भोंसले ने अपने पुत्र शिवाजी द्वितीय के नाम पर शासन संभाला और मराठा साम्राज्य को बचाने के लिए औरंगजेब के खिलाफ संघर्ष को जारी रखा। यह वह दौर था जब मुगलों को यह एहसास भी नहीं था कि एक महिला मराठाओं का नेतृत्व कर सकती है और उनकी विशाल सेना को चुनौती दे सकती है। लेकिन रानी ताराबाई ने अपनी कुशल रणनीति से मुगलों को बुरी तरह कमजोर कर दिया।
ताराबाई की युद्ध रणनीति और जीत
रानी ताराबाई ने 1700 से 1707 तक मुगलों के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध की नीति अपनाई। इस रणनीति में मराठा सैनिक छोटे-छोटे समूहों में बंटकर तेजी से हमले करते और फिर सुरक्षित स्थानों पर चले जाते। इस युद्ध नीति से मुगलों को भारी नुकसान हुआ। मुगल सेना थक गई, कमजोर हो गई, और अपने ही खेमे में विद्रोह झेलने लगी। इन सात वर्षों के दौरान, ताराबाई ने कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों को फिर से जीत लिया, जिनमें सूरत और मालवा भी शामिल थे।
1707 में औरंगजेब की मृत्यु के साथ ही मुगलों का पतन शुरू हो गया। ताराबाई की वीरता और संघर्ष ने यह सुनिश्चित किया कि मराठा साम्राज्य मुगलों के सामने न केवल टिका रहे, बल्कि भविष्य में और अधिक शक्तिशाली बनकर उभरे।
रानी ताराबाई की विरासत
रानी ताराबाई भोंसले ने न केवल मुगलों को हराया, बल्कि मराठा साम्राज्य को मजबूत करने में भी अहम भूमिका निभाई। उनकी मृत्यु 1761 में सतारा के किले में हुई, लेकिन उनका नाम भारतीय इतिहास में वीरांगनाओं में शुमार हो गया। आज भी उन्हें मराठा साम्राज्य की रक्षक और वीर योद्धा रानी के रूप में याद किया जाता है।




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