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भारतीय अस्पतालों में पाँच साल में करीब $10 अरब, बिलों पर बहस

रिपोर्ट के मुताबिक वैश्विक निवेशकों ने पाँच साल में भारतीय अस्पतालों में करीब $10 अरब लगाए। बीमा कंपनियाँ और अस्पताल बिलों पर आमने-सामने हैं।

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Image Credit: Wikimedia, CC BY-SA 4.0
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By Pandey Gaurav | Faridabad, Haryana | स्वास्थ्य - 05 October 2026

5 अक्टूबर 2026 की रिपोर्टों में EY के आँकड़े दिए गए हैं। ब्लैकस्टोन, केकेआर, टीपीजी और जनरल अटलांटिक समेत वैश्विक निवेशकों ने पिछले पाँच साल में भारतीय अस्पताल श्रृंखलाओं में करीब 10 अरब डॉलर लगाए। इस पैसे से नए अस्पताल, मशीनें और कई अस्पतालों का विलय हुआ।

रिपोर्ट के मुताबिक प्राइवेट इक्विटी वाले ऑपरेटर देश के अस्पताल बेड के 5 प्रतिशत से कम हैं, फिर भी कार्डियक और कैंसर जैसी महँगी सेवाओं में उनकी मौजूदगी है। बीमा कंपनियाँ कह रही हैं कि कुछ बिल बढ़ाए जा रहे हैं। अस्पताल कह रहे हैं कि भुगतान देर से और कम दर पर आ रहा है।

निजी इलाज सरकारी सुविधा से कई गुना महँगा पड़ सकता है। अंतर कैंसर, हृदय, किडनी और प्रसूति में ज्यादा बताया गया है। इरडाई कैशलेस इलाज और अनुमति की एक जैसी प्रक्रिया पर काम कर रहा है।

5 अक्टूबर 2026 की रिपोर्टें EY के आंकड़े का हवाला देती हैं। ब्लैकस्टोन, केकेआर, टीपीजी और जनरल अटलांटिक ने पांच साल में भारतीय अस्पताल श्रृंखलाओं में करीब 10 अरब डॉलर लगाए। प्राइवेट इक्विटी संचालक बिस्तरों के 5 प्रतिशत से कम पर हैं, लेकिन हार्ट और कैंसर इलाज में उनकी मौजूदगी है। बीमा कंपनियां कहती हैं कि कुछ बिल बढ़ाकर बनाए जाते हैं। अस्पताल कहते हैं कि भुगतान देर से और कम मिलता है। निजी इलाज का खर्च सरकारी इलाज से कई गुना है। सबसे बड़ा फर्क कैंसर, हृदय, किडनी और प्रसूति में है। इरडाई कैशलेस इलाज और एक मानक मंजूरी प्रक्रिया पर काम कर रहा है।

भारतीय अस्पतालों में पाँच साल में करीब $10 अरब, बिलों पर बहस
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