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25 साल के स्वास्थ्य रिकॉर्ड पर आधारित इस ताज़ा स्टडी में पाया गया कि हर रात सोना बहुत ज़रूरी है ताकि अल्ज़ाइमर रोग जैसे दिमागी नुकसान से बचा जा सके, क्योंकि नींद की कमी इस बीमारी के शुरुआती लक्षणों की नकल कर सकती है। शोधकर्ताओं ने पाया कि खराब नींद से बीटा-एमीलॉइड और टाऊ जैसे ज़हरीले प्रोटीन का स्तर बढ़ जाता है, जिनका संबंध अल्ज़ाइमर से है। साथ ही, यह दिमाग के उन हिस्सों के ऊतकों (tissues) के सिकुड़ने का भी एक कारण बनता है जो याददाश्त के लिए बहुत ज़रूरी होते हैं।
मेयो क्लिनिक सहित कई अनोखी स्टडीज़ में यह पाया गया है कि जिन लोगों को लंबे समय से अनिद्रा (insomnia) की समस्या है, उनमें डिमेंशिया या दिमाग की हल्की कमजोरी होने की संभावना चार गुना ज़्यादा होती है। यह स्थिति दिमाग के "3.5 साल" तक बूढ़ा होने के बराबर है। सिर्फ़ एक रात की नींद की कमी के बाद ही टाऊ प्रोटीन का स्तर 50% तक बढ़ सकता है।
शोधकर्ता चेतावनी देते हैं कि नींद में रुकावट दिमाग के "साफ-सफाई" (housekeeping) के कामों में बाधा डालती है, जिससे दिमाग के शारीरिक रूप से बूढ़ा होने की प्रक्रिया तेज़ हो जाती है। हालांकि, इसके कारण और प्रभाव (cause/effect) वाले पहलू पर अभी और शोध की ज़रूरत है, लेकिन सबूत इतने मज़बूत हैं कि हर रात 7 से 9 घंटे की अच्छी नींद लेना अब एक प्राथमिकता होनी चाहिए।
सोने का एक नियमित समय तय करना, सोने से पहले स्क्रीन (मोबाइल/टीवी) का कम इस्तेमाल करना, और जीवन के शुरुआती दौर में ही अनिद्रा का इलाज करवाना—ये सभी चीज़ें लंबे समय तक दिमाग को स्वस्थ रखने में मददगार साबित हो सकती हैं। यदि नींद की ये समस्याएँ बनी रहती हैं, तो डॉक्टर से मिलें।




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