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बॉम्बे हाई कोर्ट ने बैंक ऑफ़ बड़ौदा को एक जटिल SIM स्वैप धोखाधड़ी के परिणामस्वरूप चोरी हुए ₹1.24 करोड़ वापस करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि उन परिस्थितियों में ग्राहकों की 'ज़ीरो लायबिलिटी' होती है, जहाँ वे अनधिकृत लेन-देन के बारे में कंपनियों को तुरंत सूचित करते हैं और उनकी ओर से कोई लापरवाही नहीं होती।
धोखेबाज़ों ने पीड़ित का SIM कार्ड बदल दिया था, OTPs को इंटरसेप्ट (बीच में ही हासिल) कर लिया था, और इंटरनेट बैंकिंग के ज़रिए खाते से सारी रकम निकाल ली थी। बैंक ने दावा किया कि उसने चेतावनियाँ जारी की थीं, लेकिन कोर्ट ने इस दावे को ख़ारिज कर दिया और कहा कि SIM क्लोनिंग यह सुनिश्चित करती है कि ग्राहकों को कोई अलर्ट या सूचना प्राप्त ही न हो।
हाई कोर्ट ने BoB को आदेश दिया कि वह आठ हफ़्तों के भीतर 6% ब्याज के साथ सारी रकम वापस करे। हाल ही में अन्य साइबर धोखाधड़ी मामलों में बैंकों के ख़िलाफ़ दिए गए इसी तरह के आदेशों की कड़ी में यह सबसे नया आदेश है। यह बैंकों को एक स्पष्ट संदेश देता है कि उन्हें अपनी सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक मज़बूत करने की ज़रूरत है, और वे साइबर धोखाधड़ी के बढ़ते मामलों के बीच इसका दोष पीड़ितों पर नहीं डाल सकते (और न ही उन्हें ऐसा करना चाहिए)। इस फ़ैसले से डिजिटल बैंकिंग ग्राहकों का भरोसा फिर से जीतने में मदद मिलने की संभावना है, और इससे वित्तीय संस्थान ज़्यादा असरदार धोखाधड़ी नियंत्रण प्रणालियाँ स्थापित करने के लिए ज़्यादा सतर्क हो जाएँगे।




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