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वैश्विक तनावों के कारण LPG से जुड़ी बढ़ती समस्याओं के बीच, पर्यावरण को बचाने की एक प्रेरणादायक कहानी सामने आई है। पुणे के इंजीनियर और IIT मुंबई से ग्रेजुएट प्रियदर्शन सहस्रबुद्धे ने पिछले सात सालों में एक भी LPG सिलेंडर नहीं खरीदा है। 2019 में अपने घर पर एक छोटा बायोगैस प्लांट — 'वायु' (Vaayu) — लगाने के बाद, वे अपने और अपने पड़ोसियों के घरों से निकलने वाले लगभग 11 किलो किचन के कचरे का इस्तेमाल करते हैं। इस कचरे को वे हर दिन लगभग 800 लीटर मीथेन-युक्त कुकिंग गैस में बदल देते हैं।
'वायु' की एनारोबिक डाइजेशन (हवा की गैर-मौजूदगी में कचरा गलाने की) प्रक्रिया से साफ़ और रिन्यूएबल ईंधन बनता है, जिससे LPG की भारी बचत होती है। रिपोर्ट के अनुसार, इस सिस्टम की हर एक यूनिट से सालाना 2,500 से ज़्यादा सिलेंडरों की बचत होती है, और कचरे का एक बड़ा हिस्सा — 1,000 टन से भी ज़्यादा — लैंडफिल (कचरा डंपिंग साइट) में जाने से बच जाता है। यह नई तकनीक महाराष्ट्र और अन्य जगहों के सैकड़ों घरों में लगाई गई है। ऐसे समय में जब LPG की सप्लाई अनिश्चित रहती है, यह तकनीक एक भरोसेमंद विकल्प के तौर पर तेज़ी से लोकप्रिय हो रही है।
सहस्रबुद्धे का यह प्रयास न केवल घरों में ईंधन का खर्च कम करता है, बल्कि यह विकेंद्रीकृत (decentralized) हरित ऊर्जा को भी बढ़ावा देता है। इससे पर्यावरण पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को कम करने में मदद मिलेगी। विश्लेषक इसकी सराहना करते हुए इसे 'शहरी भारत' का एक विस्तृत रूप बता रहे हैं, जहाँ रोज़ाना के कचरे को 'हरित जीवन-शैली' के लिए एक अत्यंत मूल्यवान संसाधन में बदल दिया जाता है।




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