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सुप्रीम कोर्ट ने पलट दिया ‘इलाहाबाद हाई कोर्ट’ का फैसला– “पजामे का नाड़ा खींचना रेप का प्रयास नहीं!”

कोर्ट ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में संवेदनशीलता लाने की जरूरत है।

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By Sushant Kumar | Faridabad, Haryana | खबरें - 18 February 2026



सुप्रीम कोर्ट ने इलाहबाद कोर्ट के उस विवादित फैसले को स्वतः संज्ञान लेते हुए ख़ारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि किसी नाबालिक लड़की के स्तन पकड़ने  और पैजामे का नाड़ा ढीला करना करना बलात्कार की श्रेणी में नहीं आएगा, बल्कि वो ‘तैयारी’ में गिना जाएगा| यह मामला एक नाबालिग लड़की की मां की शिकायत से शुरू हुआ था। CrPC के सेक्शन 156(3) के तहत एक एप्लीकेशन पर कार्रवाई करते हुए, कासगंज के POCSO के स्पेशल जज ने दो आरोपियों को IPC के सेक्शन 376 और POCSO एक्ट के सेक्शन 18 के तहत समन जारी किया था। हालांकि, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने समन ऑर्डर में बदलाव किया। उसने माना कि असल आरोपों से रेप की कोशिश का पता नहीं चलता और आरोपों को बदलकर सेक्शन 354B IPC के साथ POCSO एक्ट के सेक्शन 9 और 10 कर दिया, जिनमें तुलना में कम सज़ा का प्रावधान है। हाई कोर्ट ने तर्क दिया कि आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोप सिर्फ़ “तैयारी” के थे और “कोशिश” की हद पार नहीं करते थे। जिसमें नाबालिग लड़की के साथ गंभीर यौन कृत्य को 'बलात्कार का प्रयास' मानने से इनकार किया गया था।  सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोपी द्वारा नाबालिग को पकड़ना, पाजामे का नाड़ा तोड़ना और घसीटने की कोशिश करना, ये सब 'पहले से तय मंशा' के साथ बलात्कार के प्रयास की ओर बढ़े हुए कदम हैं, इसलिए ट्रायल कोर्ट के लगाए गए गंभीर आरोप (IPC धारा 376 आदि) को बहाल किया जाता है.  

कोर्ट ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में संवेदनशीलता लाने की जरूरत है ऐसे मामलों में मानक भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक से जुड़े होने चाहिए, न कि विदेशी अवधारणाओं से उधार लेकर पीठ ने हाई कोर्ट के आदेश पर कड़ी आपत्ति जताते हुए उसे चौंकाने वाला और असंवेदनशील बताया था।  यह स्वतः संज्ञान वरिष्ठ वकील शोभा गुप्ता द्वारा NGO वी द वुमेन ऑफ इंडिया की ओर से भेजे गए पत्र के आधार पर लिया गया था।  शीर्ष अदालत ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी को यौन अपराधों के मामलों में न्यायाधीशों के नजरिये के लिए दिशा-निर्देश बनाने के लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश दिया है। 

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि आरोपों के आधार पर हम हाईकोर्ट के इस निष्कर्ष से सहमत नहीं हो सकते कि आरोप केवल बलात्कार के अपराध को अंजाम देने की तैयारी के हैं, न कि रेप का प्रयास। आरोपियों की हरकत स्पष्ट निष्कर्ष निकलता है कि दुष्कर्म के प्रयास के प्रावधानों को लागू करने का मामला बनता है। विवादित निर्णय को रद्द किया जाना चाहिए। 



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