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पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर कथित तौर पर बड़े स्तर पर असंतोष और बगावत की खबरें सामने आ रही हैं। रिपोर्टों के अनुसार, पार्टी के कई विधायक और सांसद अलग गुट बनाकर अपनी राजनीतिक राह चुनने की तैयारी में हैं। यदि यह स्थिति आगे बढ़ती है, तो यह पश्चिम बंगाल की राजनीति में वैसा ही बदलाव ला सकती है जैसा वर्ष 2022 में महाराष्ट्र में शिवसेना के विभाजन के दौरान देखने को मिला था।
58 विधायकों के अलग होने का दावा
बताया जा रहा है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा में TMC के 80 विधायकों में से 58 विधायक अलग गुट के समर्थन में सामने आए हैं। बागी विधायकों ने कथित रूप से विधानसभा अध्यक्ष को पत्र सौंपकर अपने गुट को मान्यता देने की मांग की है।
दल-बदल कानून के तहत किसी भी दल में विभाजन या विलय को मान्यता मिलने के लिए कम-से-कम दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन आवश्यक होता है। 80 विधायकों में 58 का आंकड़ा इस सीमा से ऊपर माना जा रहा है।
लोकसभा में भी बढ़ी चुनौती
लोकसभा में भी TMC को बड़ा झटका लगने की चर्चा है। जानकारी के अनुसार, पार्टी के 28 सांसदों में से 20 सांसदों ने अलग संसदीय समूह बनाने की मांग की है। इस संबंध में लोकसभा अध्यक्ष को पत्र भेजे जाने का दावा किया गया है।
इन सांसदों में कई चर्चित नाम शामिल बताए जा रहे हैं। यदि अलग गुट को मान्यता मिलती है तो संसद में TMC की राजनीतिक स्थिति पर इसका सीधा प्रभाव पड़ सकता है।
राज्यसभा में भी असर
राज्यसभा में भी पार्टी को नुकसान होने की खबरें सामने आई हैं। पिछले कुछ दिनों में कई सांसदों द्वारा इस्तीफा दिए जाने की चर्चा ने राजनीतिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है। इससे पार्टी की संसदीय ताकत और संगठनात्मक स्थिति दोनों प्रभावित हो सकती हैं।
दल-बदल कानून क्या कहता है?
भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची यानी एंटी-डिफेक्शन लॉ के अनुसार यदि किसी राजनीतिक दल के कम से कम दो-तिहाई विधायक या सांसद किसी अन्य दल में विलय करना चाहते हैं या अलग गुट बनाना चाहते हैं, तो उन्हें कानूनी संरक्षण मिल सकता है।
हालांकि अंतिम फैसला विधानसभा अध्यक्ष, लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा सभापति द्वारा लिया जाता है। उनके निर्णय को बाद में न्यायालय में चुनौती भी दी जा सकती है।
महाराष्ट्र मॉडल से हो रही तुलना
राजनीतिक विश्लेषक इस घटनाक्रम की तुलना महाराष्ट्र में शिवसेना के विभाजन से कर रहे हैं। वर्ष 2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बड़ी संख्या में विधायकों ने उद्धव ठाकरे का साथ छोड़ दिया था। बाद में चुनाव आयोग और विधानसभा अध्यक्ष के फैसलों के बाद शिंदे गुट को मान्यता मिल गई थी।
इसी वजह से पश्चिम बंगाल में सामने आ रही राजनीतिक परिस्थितियों को भी कई लोग "महाराष्ट्र मॉडल" से जोड़कर देख रहे हैं।
ममता बनर्जी के सामने सबसे बड़ी चुनौती
यदि बगावत के दावे सही साबित होते हैं, तो यह ममता बनर्जी के राजनीतिक करियर की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक हो सकती है। लंबे समय से पश्चिम बंगाल की राजनीति पर मजबूत पकड़ रखने वाली TMC को संगठनात्मक और संसदीय दोनों स्तरों पर बड़ा नुकसान झेलना पड़ सकता है।
हालांकि पार्टी नेतृत्व की ओर से स्थिति को संभालने और कानूनी विकल्पों पर विचार करने की संभावना भी जताई जा रही है।




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