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भारत के संख्या सिद्धांतकार श्रीनिवास रामानुजन अयंगर (22 दिसंबर 1887 – 26 अप्रैल 1920) अब तक के महानतम गणितज्ञों में से एक थे। जन्म से एक निर्धन ब्राह्मण, रामानुजन का पालन-पोषण तमिलनाडु के इरोड में हुआ था, और उन्होंने बहुत कम औपचारिक शिक्षा के साथ घर पर ही पढ़ाई की थी।
रामानुजन ने केवल एक पुस्तक से उच्च गणित सीखा और स्वतंत्र रूप से संख्या सिद्धांत, अनंत श्रेणियों, सतत भिन्नों और संख्याओं के विभाजनों पर कार्य करना प्रारंभ कर दिया। वर्ष 1913 में उन्होंने कैम्ब्रिज स्थित अंग्रेज़ गणितज्ञ जी.एच. हार्डी को एक प्रसिद्ध पत्र भेजा, जिसके बाद हार्डी उन्हें वर्ष 1914 में इंग्लैंड ले गए।
वहाँ उन्होंने मिलकर कई उत्कृष्ट कार्य किए, जिनमें 'हार्डी-रामानुजन एसिम्प्टोटिक फ़ॉर्मूला' (Hardy-Ramanujan asymptotic formula) प्रमुख है। वर्ष 1918 में रामानुजन को 'रॉयल सोसाइटी का फेलो' (Fellow of the Royal Society) चुना गया—वे यह सम्मान पाने वाले सबसे कम आयु के व्यक्तियों में से एक थे। उनकी यह विशेषता थी कि वे बिना किसी प्रमाण (proof) के ही गणितीय परिणाम प्राप्त कर लेते थे; उनके द्वारा खोजे गए ऐसे कई परिणामों का प्रमाण आज भी खोजा जाना शेष है।
इंग्लैंड प्रवास के दौरान रामानुजन का स्वास्थ्य प्रायः खराब रहता था। रामानुजन 1919 में घर लौटे और 26 अप्रैल 1920 को 32 वर्ष की कम उम्र में उनका निधन हो गया। उन्हें 'मॉक थीटा फ़ंक्शन' और 'रामानुजन प्राइम्स' जैसी अवधारणाओं के माध्यम से याद किया जाता है, जिन्होंने समकालीन गणित पर गहरा प्रभाव डाला है।




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