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राज्यसभा की 12 सीटों के लिए 16 अक्तूबर को चुनाव होना है, जिनमें सबसे ज़्यादा 10 सीटें उत्तर प्रदेश की हैं। नामांकन की आख़िरी तारीख़ छह अक्तूबर है। उससे एक दिन पहले, पांच अक्तूबर को बीजेपी ने उत्तर प्रदेश से अपने आठ उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिए।
नाम सामने आने से पहले कई अटकलें थीं। मीडिया में स्मृति ईरानी, कुमार विश्वास, संजीव बालियान, हरीश द्विवेदी, कौशल किशोर और राजवीर सिंह जैसे नामों की चर्चा थी, और क़रीब 20 नामों पर विचार की ख़बरें भी थीं। पर आधिकारिक सूची में ये नाम नहीं आए।
सबसे बड़ी बात यह है कि बीजेपी ने यूपी के अपने सात मौजूदा राज्यसभा सांसदों में से किसी को भी दोबारा मौक़ा नहीं दिया। ये सांसद हैं हरदीप सिंह पुरी, बीएल वर्मा, अरुण सिंह, सीमा द्विवेदी, नीरज शेखर, बृजलाल और गीता शाक्य। पुरी और वर्मा मोदी सरकार में मंत्री भी हैं। चुनाव में पूर्व उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा की ख़ाली सीट भी शामिल है, जिन्होंने सितंबर में अंडमान-निकोबार का उपराज्यपाल बनाए जाने के बाद इस्तीफ़ा दिया था।
पार्टी इसे रूटीन फ़ैसला बताती है। बीजेपी के राकेश त्रिपाठी के मुताबिक़ पार्टी समय और ज़रूरत के हिसाब से कार्यकर्ताओं की भूमिका तय करती है और सूची में संगठन के पुराने नेताओं के साथ अलग-अलग क्षेत्रों और सामाजिक समूहों के लोग शामिल हैं।
बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार धर्मपाल सिंह यूपी सरकार में पशुधन मंत्री और आंवला से विधायक हैं और लोध समुदाय से आते हैं। प्रकाश पाल बीजेपी के ओबीसी मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष हैं। श्रुति गंगवार झारखंड के राज्यपाल संतोष गंगवार की बेटी हैं और बरेली की एक अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक की चेयरपर्सन हैं। त्रिपाठी ने विद्यासागर सोनकर, प्रियंका रावत, राम प्रताप सिंह चौहान और गोपी कृष्ण पांडेय के नाम भी गिनाए।
सवाल यही है कि क्या यह फ़ैसला केवल अनुभवी कार्यकर्ताओं को आगे लाने तक सीमित है, या इसके पीछे 2027 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर सामाजिक और जातीय संदेश देने की रणनीति भी है।
स्रोत: BBC Hindi




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