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कीटनाशकों के संपर्क में आने के प्रभावों पर की गई एक विस्तृत नई स्टडी में यह सामने आया है कि इससे कैंसर का खतरा 150% तक बढ़ सकता है। इस स्टडी में ऐसे सबूत मिले हैं कि ऑर्गेनोफॉस्फेट और ग्लाइफोसेट-आधारित उत्पादों जैसे आम कीटनाशकों के लंबे समय तक संपर्क में रहने से नॉन-हॉजकिन लिम्फोमा, ल्यूकेमिया, प्रोस्टेट, फेफड़े और त्वचा के कैंसर होने की दर काफी ज़्यादा पाई गई है।
सांस लेने, त्वचा के संपर्क में आने या पीने के पानी के ज़रिए कीटनाशकों के संपर्क में आना किसानों, खेतिहर मज़दूरों और खेतों के आस-पास या खेतों में रहने वाले लोगों के लिए सबसे बड़ा खतरा है। यह स्टडी इस बात पर भी ज़ोर देती है कि भले ही खाने-पीने की चीज़ों में कीटनाशकों के अवशेष बहुत कम मात्रा में हों, फिर भी उनके संपर्क में आने से होने वाला कुल खतरा काफी ज़्यादा होता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इस मामले में नियमों को और ज़्यादा सख़्ती से लागू करने, किसानों की सुरक्षा के लिए और ज़्यादा कदम उठाने और जैविक खेती को बढ़ावा देने की सख़्त ज़रूरत है। विशेषज्ञों ने 'एकीकृत कीट प्रबंधन' (Integrated Pest Management) के ज़रिए कीटनाशकों पर निर्भरता कम करने के लिए तुरंत कदम उठाने का सुझाव दिया है। यह शोध आधुनिक खेती के सेहत पर पड़ने वाले उन प्रभावों के बारे में बढ़ती वैश्विक जागरूकता को और मज़बूत करता है, जो भले ही सीधे तौर पर दिखाई न देते हों, लेकिन बेहद विनाशकारी साबित हो सकते हैं; साथ ही यह इस बात पर भी ज़ोर देता है कि हमें आधुनिक खेती के सुरक्षित विकल्पों की कितनी सख़्त ज़रूरत है।




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