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विवादित डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह मंगलवार को 30 दिन की पैरोल मिलने के बाद रोहतक की सुनारिया जेल से बाहर निकला। साध्वी यौन शोषण मामले में 2017 में दोषी ठहराए जाने के बाद से यह उसकी 16वीं अस्थायी रिहाई है — जिसमें से 15 बार पैरोल पर और एक बार फरलो पर रिहाई मिली है — इसी मामले में वह 20 साल की सज़ा काट रहा है।
खुद को भगवान का दूत बताने वाले इस बाबा को इससे पहले जनवरी 2026 में भी 40 दिन की पैरोल मिली थी। विपक्षी दलों और पत्रकार राम चंदर छत्रपति की मीडिया टीम का हिस्सा रहे आलोचकों ने उसकी बार-बार होने वाली रिहाई पर अक्सर सवाल उठाए हैं; उनका कहना है कि गंभीर अपराधों के मामलों में इस तरह की रिहाई न्याय से वंचित करने जैसा है। उनके समर्थकों और उनकी कानूनी टीम का मानना है कि पैरोल कानून द्वारा दिया गया एक अधिकार है, जिसका हकदार कोई भी दोषी व्यक्ति उचित कानूनी प्रक्रियाओं के बाद होता है। राम रहीम को इससे जुड़े हत्या के मामलों में भी आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई है। उनकी रिहाई अक्सर डेरा के अपने हाई-प्रोफाइल कार्यक्रमों के आस-पास ही होती है, जिससे इस बात पर राजनीतिक और सार्वजनिक चर्चा छिड़ जाती है कि हरियाणा सरकार हाई-प्रोफाइल कैदियों के साथ कैसा बर्ताव कर रही है। इस ताज़ा पैरोल ने एक बार फिर न्याय व्यवस्था में समानता के मुद्दे को उठा दिया है।




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