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सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को पैक्ड फूड के लिए अनिवार्य 'फ्रंट-ऑफ-पैक वॉर्निंग लेबल' (FoPL) पर फैसला लेने के लिए दो हफ़्ते का सख्त अल्टीमेटम दिया है। ये लेबल पैकेट के सामने साफ़ तौर पर ज़्यादा शुगर, नमक और सैचुरेटेड फैट की जानकारी देंगे, जिससे ग्राहकों — खासकर बच्चों — के लिए एक नज़र में ही अस्वास्थ्यकर उत्पादों की पहचान करना आसान हो जाएगा। जस्टिस जेबी पारदीवाला और के विनोद चंद्रन की बेंच ने इस मुद्दे को आर्टिकल 21 के तहत 'जीवन के अधिकार' और बढ़ते मोटापे की दर से जोड़ा। कोर्ट ने चिली, इज़राइल और कनाडा जैसे देशों में पहले से अपनाए जा रहे मानकों को लागू करने में सरकार की हिचकिचाहट पर सवाल उठाया और पूछा कि क्या पब्लिक हेल्थ के उपायों के मामले में भारत को विकसित देशों से पीछे रहना चाहिए। यह मामला NGO '3S' और 'आवर हेल्थ सोसाइटी' की एक PIL (जनहित याचिका) से जुड़ा है, जिसमें अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड पर ज़्यादा सख्त न्यूट्रिशनल वॉर्निंग की मांग की गई थी। भारत में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड मार्केट तेज़ी से बढ़ने और बच्चों में मोटापा बढ़ने के कारण, कोर्ट ने साफ़ कर दिया कि अगर केंद्र कार्रवाई करने में नाकाम रहता है, तो वह खुद आगे के निर्देश जारी करेगा।




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