Story Content
चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को यह अधिकार प्राप्त है कि वह मतदाता सूची में नाम शामिल करने से पहले नागरिकता की जांच कर सके। अदालत ने इसे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के संवैधानिक सिद्धांत को लागू करने की दिशा में एक वैध प्रक्रिया बताया।
याचिकाकर्ताओं की दलील सुप्रीम कोर्ट ने की खारिज
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि SIR के जरिए चुनाव आयोग “घुसपैठियों” को हटाने के नाम पर पीछे के दरवाजे से नागरिकता जांच की प्रक्रिया चला रहा है।
याचिका में आरोप लगाया गया था कि चुनाव आयोग मनमाने तरीके से नागरिकता तय करने की शक्तियां अपने हाथ में लेने की कोशिश कर रहा है और संसद द्वारा बनाए गए कानूनों व अपने ही नियमों की सीमाओं को पार कर रहा है।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया और कहा कि चुनाव आयोग का यह कदम उसके संवैधानिक अधिकार क्षेत्र के भीतर आता है।
बिहार से शुरू हुआ मामला, अब 12 राज्यों तक पहुंचा SIR
बिहार में SIR की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखने वाले इस फैसले का असर अब देश के अन्य राज्यों में भी देखने को मिलेगा।
दरअसल, बिहार मामले की सुनवाई के दौरान ही SIR का दूसरा चरण शुरू कर दिया गया था, जिसमें पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और असम समेत 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लगभग 51 करोड़ मतदाताओं को शामिल किया गया है।
इस फैसले के बाद चुनाव आयोग को देशभर में मतदाता सूची की गहन जांच प्रक्रिया जारी रखने का कानूनी आधार मिल गया है।
विपक्ष और कानूनी विशेषज्ञों की तीखी प्रतिक्रिया
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर अलग-अलग राजनीतिक और कानूनी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने इस फैसले को न्यायपालिका के लिए “काला दिन” बताया। वहीं इस मामले के याचिकाकर्ता और राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव ने कहा कि उन्हें इस फैसले से कोई आश्चर्य नहीं हुआ।
दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए इसे लोकतंत्र और चुनावी पारदर्शिता के लिए महत्वपूर्ण कदम बताया है।
क्या है SIR और क्यों मचा है विवाद?
स्पेशल इंटेंसिव रिविजन यानी SIR चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची की गहन समीक्षा की प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि केवल वैध भारतीय नागरिकों के नाम ही वोटर लिस्ट में शामिल रहें।
हालांकि विपक्षी दलों और कुछ सामाजिक संगठनों का आरोप है कि इस प्रक्रिया का इस्तेमाल नागरिकता जांच के लिए किया जा सकता है, जिससे कई वैध मतदाताओं को परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।
अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद साफ हो गया है कि चुनाव आयोग को इस तरह की जांच करने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है।




Comments
Add a Comment:
No comments available.