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New Delhi, November 8, 2026: लालकृष्ण आडवाणी: जब निजी स्वार्थ की दी बलि, पार्टी के लिए कर दिया राजनीति का सबसे बड़ा बलिदान.
The source note says: हालांकि आडवाणी के इस फैसले को केवल व्यक्तिगत त्याग के तौर पर देखना पूरी कहानी नहीं होगी. इसके पीछे उनकी राजनीतिक समझ भी थी. उन्हें एहसास था कि भाजपा को केंद्र की सत्ता तक पहुंचने के लिए अपने पारंपरिक समर्थक वर्ग से आगे बढ़ना होगा. अटल बिहारी वाजपेयी की छवि अपेक्षाकृत उदार थी. विपक्षी दलों और क्षेत्रीय पार्टियों के बीच भी उनकी स्वीकार्यता ज्यादा थी. आडवाणी जानते थे कि राम मंदिर आंदोलन ने भाजपा को राजनीतिक ताकत तो दी है, लेकिन केंद्र में सरकार बनाने के लिए सहयोगियों की जरूरत पड़ेगी. वाजपेयी का नेतृत्व इस काम में ज्यादा कारगर हो सकता था. भाजपा के सामने उस समय सबसे बड़ी चुनौती गठबंधन की राजनीति में स्वीकार्यता हासिल करना था. आडवाणी ने अपनी ताकत के बजाय पार्टी की संभावनाओं को प्राथमिकता दी.
The source note says: यह फैसला आगे चलकर भाजपा के लिए काफी अहम साबित हुआ. 1996 में सरकार भले ही 13 दिन चली, लेकिन 1998 में भाजपा फिर सत्ता में लौटी. इस बार वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनी. 1999 में दोबारा चुनाव के बाद वाजपेयी ने अपना कार्यकाल पूरा किया. इस तरह भाजपा को पहली बार गठबंधन के सहारे केंद्र में स्थिर सरकार चलाने का मौका मिला.
The source note says: आडवाणी ने प्रधानमंत्री पद के लिए वाजपेयी का नाम आगे किया, लेकिन इसका मतलब यह नहीं था कि उनकी राजनीतिक भूमिका कम हो गई. 1998 में भाजपा की सरकार बनने के बाद वह गृह मंत्री बने. 1999 में फिर सरकार बनने पर भी गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी उनके पास रही. जून 2002 में उन्हें देश का उपप्रधानमंत्री बनाया गया. यह वह दौर था जब वाजपेयी और आडवाणी की जोड़ी भाजपा की राजनीति का सबसे मजबूत चेहरा थी. वाजपेयी सरकार चलाने और सहयोगियों को साथ रखने में माहिर थे, जबकि आडवाणी संगठन और पार्टी के राजनीतिक आधार को मजबूत करने में जुटे थे. दोनों की अलग-अलग राजनीतिक शैलियों ने भाजपा को राष्ट्रीय राजनीति में मजबूत जगह दिलाई.
The source note says: आडवाणी की राजनीतिक यात्रा को केवल प्रधानमंत्री न बन पाने के नजरिए से देखना उनके योगदान को छोटा करना होगा. 1980 में भाजपा की स्थापना के बाद उसे दो सीटों से राष्ट्रीय राजनीति की सबसे बड़ी पार्टी बनाने में उनकी भूमिका बेहद अहम रही. 1986 में पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने संगठन को नई दिशा दी. राम रथ यात्रा ने भाजपा को देशव्यापी राजनीतिक पहचान दिलाई. इसके बाद पार्टी का जनाधार लगातार बढ़ता गया. आपातकाल के दौरान जेल जाने से लेकर जनता पार्टी की सरकार में सूचना एवं प्रसारण मंत्री बनने, भाजपा अध्यक्ष, गृह मंत्री और उपप्रधानमंत्री तक का उनका सफर कई राजनीतिक उतार-चढ़ावों से गुजरा.
The source note says: भारतीय राजनीति में ऐसे उदाहरण कम मिलते हैं जब कोई नेता अपनी लोकप्रियता और संगठन पर पकड़ के बावजूद खुद से आगे किसी दूसरे नेता को रख दे. आडवाणी ने 1995 में ऐसा किया. उन्होंने समझा कि भाजपा को सत्ता तक पहुंचाने के लिए वाजपेयी का चेहरा अधिक उपयोगी हो सकता है. यह फैसला व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर पार्टी की राजनीतिक जरूरतों को रखने का उदाहरण बना.
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Source: Instafeed Desk.
Photo: Uprising Man, Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0

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